कीचड़ में फंसी सड़क, जर्जर नहर मेड़ के सहारे ग्रामीणों का जीवन, स्कूली बच्चे परेशान

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कोतबा। सरकार गांव-गांव तक सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। पत्थलगांव विकासखंड के ग्राम पंचायत पतरा टोली के आश्रित ग्राम सरईकोना में ग्रामीण आज भी बदहाल सड़क और नहर की जर्जर मेड़ के कारण भारी परेशानियों का सामना कर रहे हैं।

गांव तक पहुंचने के लिए मुख्य रूप से दो रास्ते हैं, लेकिन बारिश के दिनों में दोनों ही रास्ते कीचड़ और पानी से लबालब हो जाते हैं। सड़क की हालत इतनी खराब है कि वाहनों का आवागमन तक मुश्किल हो गया है। ग्रामीणों को जरूरी काम के लिए भी भारी परेशानी उठानी पड़ रही है।

🎒 सबसे ज्यादा परेशानी स्कूली बच्चों को
बदहाल सड़क का सबसे ज्यादा असर स्कूली बच्चों और शिक्षकों पर पड़ रहा है। बच्चों को रोजाना कीचड़ और फिसलन भरे रास्तों से होकर स्कूल जाना पड़ता है। कई बार फिसलकर गिरने से बच्चों के कपड़े, किताबें और स्कूल बैग तक खराब हो जाते हैं।
ग्रामीणों के अनुसार गांव का प्रमुख रोखबहार-सुमलीपारा मार्ग भी बारिश में पूरी तरह कीचड़ में तब्दील हो चुका है। ऐसे में ग्रामीणों के सामने सुरक्षित आवागमन की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

🚑 स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी असर

गांव में सड़क की बदहाली का असर स्वास्थ्य सेवाओं पर भी पड़ रहा है। गर्भवती महिला, बुजुर्ग या गंभीर मरीज को अस्पताल ले जाने में काफी परेशानी होती है। ग्रामीणों का कहना है कि खराब रास्ते के कारण कई बार एंबुलेंस को भी गांव तक पहुंचने में दिक्कत होती है।

🌧️ नहर की मेड़ बनी मजबूरी का रास्ता

जब कच्ची सड़क पानी और कीचड़ से भर जाती है, तो ग्रामीण नहर की मेड़ को वैकल्पिक रास्ते के रूप में इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। लेकिन बारिश के दौरान यह रास्ता भी फिसलन भरा और खतरनाक हो जाता है। इससे दुर्घटना का खतरा लगातार बना रहता है।
ग्रामीणों का कहना है कि शासन-प्रशासन से कई बार सड़क निर्माण, नहर मेड़ की मरम्मत और गांव के लिए सुरक्षित एवं पक्की सड़क उपलब्ध कराने की मांग की जा चुकी है, लेकिन अब तक समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पाया है।

❓ ग्रामीणों का सवाल—आखिर कब बदलेगी तस्वीर?
सरईकोना के ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि गांव तक स्थायी सड़क का निर्माण कराया जाए, नहर की जर्जर मेड़ की मरम्मत की जाए और बारिश के दिनों में आवागमन के लिए सुरक्षित वैकल्पिक व्यवस्था की जाए, ताकि बच्चों, बुजुर्गों, मरीजों और आम ग्रामीणों को परेशानी से राहत मिल सके।
अब सवाल यही है कि ग्रामीणों की यह समस्या कब खत्म होगी और सरईकोना गांव को आखिर कब मिलेगी एक सुरक्षित और पक्की सड़क?

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